Friday, January 28, 2011
Saturday, January 22, 2011
Monday, January 17, 2011
इसी यज्ञ-वेदी से
मन करता है ,
एक तीर छोडूँ
यहीं इसी यज्ञ-वेदी से ,
जिस पर तुमने मुझे दीक्षित किया है !
मणि-बांध पर कलापक बाँध ,
पावित्री पहन ,
हाथ में श्रुवा ले ,
इधर मैं हवन कर रहा हूँ
और उधर कोई जयंत
अपनी काक-चंचु से
क्षत-विक्षत किये दे रहा है
प्रिया की समूची देह ,
सारा वन-प्रांतर,
मेरा मन, मेरी भावना
मेरा समूचा चित्रकूट!
मन करता है ,
एक तीर छोडूँ ,
जो खंड-खंड कर दे
इस जयंत देह को ,
इस निरंतर दीर्घ होती
काक-चंचु को !
पर जैसे शाप-ग्रस्त हो गयी है
यह मेरी शिव-धनुष तोड़ने वाली भुजा
अब जिस धनुष को छूता हूँ
टूक-टूक हो जाता है !
मन तो करता है ,
एक तीर छोडूँ
यहीं इसी यज्ञ-वेदी से
जिस पर तुमने मुझे दीक्षित किया है !
Sunday, January 16, 2011
यज्ञ -वेदी
जाने क्यों ?
यह अनहोनी बार-बार होती है -
मैं कोई ऋषि तो नहीं हूँ
फिर भी मेरे मन में
एक ऋचा जन्म लेती है !
मैं वैदिक हो जाता हूँ
और मन आदिम गंध से भर उठता है !
मैं जानता हूँ ,तुम उर्वशी नहीं हो
पर अपने इस पुरुरवा -मन का क्या करूँ
तुम शकुंतला भी नहीं हो ,
तुम गंगा हो,
और यह जो एक हठीला 'देवव्रत ' शब्द
मेरे मन में छोड़ गयी हो
यह मेरे लिए
एक आरण्यक अभिव्यक्ति का सृजन करता है
मेरे चारों ओर
भाषा का एक उत्सव होने लगता है
एक सोमवल्ली सर्वांग से निचुड़ कर
सामकंठी बन जाती है,
शब्द-शब्द अनुष्टुप नृत्य में
निमग्न हो जाता हैं
और कविता मेरे लिए पर्व हो उठती है,
जीवन हवन-कुण्ड सा जलता है
एक-एक दिन हविष्यान्न बनता है
जाने क्यों ?
यह अनहोनी बार-बार होती है
मैं कोई ऋषि तो नहीं हूँ
फिर भी मेरे मन में
एक ऋचा जन्म लेती है !
अनवरत
यों ही जागता रहेगा
नदी में शाश्वत राग,
अनवरत विलास ,
यों ही झंकृत होती रहेगी
नदी की आदिम देह ,
यों ही ऊँघते किनारों को
कुहनियाँ मार,
चुटकियाँ भर ,
जगाती रहेगी नदी ,
गीत गायेगी ,सार्थक करेगी
अपनी देह, अपना मन ,अपनी आत्मा !
यों ही हहराती रहेगी
नदी अनुरागिनी ,
यों ही सुखोर्मियाँ उछालेगी
नदी जल-भामिनी !
योंही,योंही
यह यह बिछा हुआ जल-सुख
वर्ण- वर्ण में अंकित,
शब्द-शब्द में अर्थित ,
सागर-निवेदित
नदी का छन्दोल्लास
कभी ख़त्म नहीं होगा
कभी नहीं रुकेगी
यह अनवरत धारा
कभी नहीं चुकेगा
यह चिर-उत्स !
सिन्धुप्रिया _______
सिन्धुप्रिया के मन में
कहीं कोई कामना फँसी है,
किसी आदिम रम्यता का
कोई व्यापक सम्मोहन ,
कर्षित कर रहा है उसे
नहीं तो यों-
स्तंभित
एक रूपरचना
एक चित्र नहीं होती नदी !
कहीं कुछ पा लेने की
हर्ष गद-गद स्वीकृति ,
कोई तन्मय स्वर-लिपि है -
नदी की देह-वीणा में-
नहीं तो यों गीत नहीं होती नदी !
किसी आकुल शब्द-रचना का
कोई अप्रकट अनुष्टुप
उद्वेलित कर रहा है -
नदी का मन ,
नहीं तो यों छन्द नहीं होती नदी !
कहीं कुछ है
अनुभूत
सहज अभिव्यक्ति-काम्य
उमड़ता हुआ
नहीं तो यों ,
एक असमाप्त यात्रा
एक अनवरत शब्द नहीं होती नदी !
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