Sunday, April 10, 2011
Monday, March 14, 2011
मध्यान्तर
द्रष्टा और दृश्य में
एक अनवरत अन्तर है !
वैसे तो दृश्य कुछ नहीं -
द्रष्टा की अनुभूति है,
पर प्रश्न यह उठता है ,
कि यह भ्रम ,
यह अन्तर ,
मिटता क्यों नहीं
दृश्य ज्यों का त्यों ,
जैसा है,
वैसा ही दिखता क्यों नहीं
लहरों के निर्दिष्ट सत्य के साथ
लोग क्यों बहे ,
क्यों उतर गए -
पानी में बहुत गहरे !
किनारों के
प्रतीक्षित सत्य के साथ
क्यों नहीं ठहरे !
उत्तराधिकार
बस थोड़ी देर
मुझसे उत्तराधिकार न माँगो
कुछ ही क्षणों में
मेरी खुली हुई बाहें
अनुत्तरित प्रश्नों का आकाश
बाँध लेंगी
अभी तो कंठ में अटके
पाषण से टकरा कर
अन्दर की प्राणवायु
अन्दर ही घुट रही है !
नूतन सृष्टि के लायक
रक्त निर्विष कहाँ हुआ है !
अभी तो अधबनें वृत्तों
और टूटती परिधियों के
सारे बिंदु चोरी हो जायेंगे
बस थोड़ी देर मुझसे
और उत्तराधिकार न माँगो !
Tuesday, March 1, 2011
Friday, February 18, 2011
अभयारण्य
यहाँ
इस अभयारण्य में ,
वन्य-जीवन
पूरा सुरक्षित है
कितनी मुक्त है
--वनता
यहाँ दूर-दूर तक ,
उछालना ,कुचलना ,दबोचना,
या कुण्डली में बाँध कर पीसना-
मारना-मरना ,
कितना सहज है
मौका लगने पर
गीदड़ों तक का यहाँ आक्रमण करना ,
सिंह का आक्रमण
यहाँ का विशिष्ट आयोजन है
सिंह जब हिरनी को दबोचता है
तब,
तभी तो लगता है
हमारे भीतर भी कहीं कोई
अभयारण्य है,
कहीं कोई जंगल दुबका है
हमारे मनों में
नहीं तो यहाँ इस तरह ,
क्यों होते हम वनों में !
Saturday, January 29, 2011
वन-निष्ठा
मैंने नहीं सोचा था
कि मेरे लिए
मेरी वन-निष्ठा का
यह परिणाम होगा
वन-महोत्सव पर
तालियाँ बजाकर अभी मैं उठा ही था
कि तुमने मुझे भी
एक वृक्ष की तरह रोप दिया !
तालियों की गड़- गड़ाहट ,
अभी थमी भी न थी ,
कि वृक्ष सहसा बहुत ऊँचे हो गए,
और लताओं ने ,
एक गहन कान्तार का सृजन किया !
तुम्हारे शब्दों का जादू ,
मैं जानता तो था ,
पर यह नहीं सोचा था
कि मेरे तुम्हारे बीच
वन सहसा इतना घना हो जायेगा
तुम पास होकर भी इतनी दूर हो जाओगे !
कुछ बड़े सही ,
पर तुम भी हमारी तरह ,
वृक्ष हो जाओगे !
अब यहाँ,
इस गहन वन में
हमारे पीछे छुपी
हिंस्र हुंकारे हैं , आक्रामक गुर्राहटें हैं ,
लपलपाती जीभें हैं -
इन्होंने हमें नहीं डसा !
अभी-अभी ये अजगर
हमारे बीच से निकल कर गया ,
इसने हमें नहीं कसा,
तो अपने वन होने का एहसास
और घना हो गया !
मुझे तुम्हारे शब्दों के जादू पर
विश्वास तो था ,
पर मैंने यह नहीं सोचा था ,
कि हम इतनी जल्दी
सहसा वन हो जायेंगे !
Friday, January 28, 2011
अनुभूत
वह सब कुछ जो घटा,
वह सब कुछ जो दिखा
और वह सब कुछ
जो अनुभव में आया
शब्द नहीं हुआ
मेरे शब्दकृत से
मेरा निश्शब्द -कृत था
कहीं ज्यादा बड़ा,
कहीं ज्यादा प्रवहमान ,
कहीं ज्यादा ज्वलंत -
जिसे शब्द सह नहीं सका
और जिसे
कवि होकर भी
मैं कह नहीं सका !
अनुभूत को वचन देना
साधना है,
तपस्या है,
परीक्षा है,
जो बहुत कड़ी है,
आदमी की अस्मिता,
भाषा से कहीं ज्यादा-
बड़ी है !
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